फरीदाबाद। औद्योगिक नगरी का कोई मुकाबला नहीं। अगर, बात आधुनिकता की हो, तो भी इस शहर का कोई सानी नहीं है। फिर, बात जब परंपरा की हो, तो आप कल्पना भी नहीं करेंगे कि यहां आजादी के जमाने के वैदिक परंपरा की गुरुकुल भी चल रहा है। जी हां, चौंकिए मत! शहर में आज भी गुरुकुल परंपरा संजोई जा रही है, जहां छात्रों को धोती-कुर्ता, चोटी और जनेऊ के साथ देखा जा सकता हैं।
स्वामी श्रद्धानंद का इंद्रप्रस्थ गुरुकुल आज भी वैदिक परंपरा का निर्वहन कर रहा है। गुरुकुल में आर्य समाज के मूल्यों को अपनाकर बच्चों को नैतिक, वैदिक, बौद्धिक और आत्मबल के साथ व्यवहारिक शिक्षा दी जा रही है। इसकी स्थापना 19१6 में स्वामी श्रद्धानंद ने भारतीयों को वैदिक शिक्षा देने के उद्देश्य से की थी। यहां कक्षा पांचवीं से बीए शास्त्री तक की पढ़ाई होती है लेकिन यह अन्य स्कूल-कॉलेजों से पूरी तरह अलग है। कल का गुरुकुल आज के आधुनिक कॉलेजों या स्कूलों से पीछे नहीं है। यहां हर तरह की सुविधा मौजूद है। गुरुकुल का प्रबंधन आर्य प्रतिनिधि सभा रोहतक द्वारा की जाती है।
बच्चों को परंपराआें से जोडऩे की पहल : गुरुकुल में वैदिक परंपराओं की शिक्षा के साथ कंप्यूटर और अंग्रेजी की भी ज्ञान दी जा रही है। इसके अलावा संस्कृत भी बच्चों को सिखाया जाता है। यहां छात्रों को भोजन भी दी जाती है और उन्हें संस्कृति एवं संस्कार की शिक्षा प्रदान की जाती है। गुरुकुल प्रबंधन की मानें, तो यहां ज्यादातर शिक्षार्थी मध्यम वर्ग के तअल्लुक रखते हैं। बच्चों को यहां शिक्षित करने के पीछे उनका मानना है कि आजकल लोग मुख्य शिक्षा के साथ आने वाली पीढ़ी में परंपराआें, संस्कारों का भी मिश्रण चाहते हैं। खास बात यह है कि इस गुरुकुल में दस साल से लेकर 19 साल तक के बच्चों को ही प्रवेश दिया जाता है। छात्रा को प्रवेश नहीं दी जाती है। गुरुकुल प्रबंधन की मानें तो प्रत्येक बच्चों पर प्रति वर्ष 24000 रुपए खर्च की जाती है और छात्रों से किसी तरह की फीस नहीं ली जाती है। बच्चों की दिनचर्या सुबह चार बजे से ही शुरू हो जाती है। सुबह जागरण और मंत्रोच्चारण के साथ दिन की शुरूआत होती है। व्यायाम करने के बिना छात्रों को कक्षा में आने नहीं दी जाती है। सुबह नौ से शाम चार बजे तक कक्षाएं लगती है। सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए गुरुकुल के छात्रों को ही तैयार किया जाता है।
गुरु-शिष्य परंपरा के साथ नियम-संयम भी : यहां गुरु-शिष्य परंपरा के साथ-साथ अन्य नियम-संयम पर भी ध्यान दिया जाता है, जिनमें भोजन करना, संस्कृत एवं वैदिक अध्ययन, विद्युत इस्तेमाल व टेलीविजन देखने से बचने आदि की सलाह शामिल है। इसके पीछे तर्क यह है कि यदि आने वाली पीढ़ी को भौतिक संसाधनों और विलासिता पूर्ण सामग्री की उपलब्धता नहीं भी हो, तो भी उनकी जीवन शैली प्रभावित नहीं हो। वैदिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गुरुकुल में प्रवेश शुल्क निर्धारित नहीं है। पूरा गुरुकुल प्रबंधन दान दाताआें की दान राशि से संचालित होता है। प्रवेश शुल्क की जगह यहां अभिभावकों को दान के लिए प्रेरित किया जाता है। कक्षा में शिक्षक भी धोती-कुर्ता पहन कर आते है।
योग और कंप्यूटर के साथ देशभक्ति भी सीखते हैं बच्चे : गुरुकुल में बीए शास्त्री तक के करीब 80 बच्चों को वैदिक गणित, कंप्यूटर, अंग्रेजी, संस्कृत, योगा और कुस्ती आदि की शिक्षा दी जाती है। कक्षाआें को ग्रेड (श्रेणी) के आधार पर बांटा गया है, जिसमें विवेक (इंटेलिजेंस), विनय (रिस्पेक्ट) और सिद्घांत (प्रिंसिपल) शामिल हैं। छात्रों को जमीन पर टाट बिछाकर पढ़ाया जाता है।शहीद स्मृति संग्रहालय भी : गुरुकुल में भूमिगत अमर शहीद स्मृति संग्रहालय भी है। जहां स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो के लिए रणनीति बनाई थी। इसके द्वारा नए पीढ़ी के छात्रों को देश प्रेम की भावना और हंसते-हंसते बलिदानियों की तरह फांसी पर चढऩे के लिए प्रेरित की जाती है।
गुरुकुल एक नजर
स्थापना : 1916
संस्थापक : स्वामी श्रद्धानंद
क्षेत्रफल : 216 एकड़
कक्षा : पांचवीं से बीए शास्त्री
छात्र : 80
कंप्यूटर : चार
पुस्तकालय : एक
-----मो. शाहनवाज
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